चरणामृत के चमत्कारी उपाए
शास्त्र के अनुसार मंदिर जाने मात्र से ही हमारे कई जन्मों
के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अक्षय पुण्य की प्राप्ति हो जाती
है। मंदिर में स्थित भगवान की प्रतिमाओं के कारण मंदिर का वातावरण शुद्ध व पवित्र रहता है तथा वहां उपलब्ध चीजें भी चमत्कारी होती हैं। सामान्य रूप से मंदिर से प्रसाद तो सभी लोग ही लेते हैं लेकिन प्रसाद के साथ एक और चीज ग्रहण करनी चाहिए जो कि चमत्कारी असर रखती है।
यहां जानते है उस खास चीज के बारे में खास
जानकारी जो कि ज्यादातर लोग नहीं जानते होते हैं…
श्रीरामचरितमानस के रचैता गोस्वामी तुलसीदास के
अनुसार जब भगवान श्रीराम, माता सीता तथा भईया लक्ष्मण ने अयोध्या से वनवास के लिए प्रस्थान किया उस दौरान उनकी भेंट एक केवट से हुई थी।
उस केवट ने भगवान श्रीराम, माता सीता तथा भैया लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाकर पवित्र गंगा नदी को पार करवाया था। उस केवट ने भगवान श्रीराम से कहा था कि…
पद पखारि जलुपान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।
अर्थात् केवट ने भगवान श्रीराम के चरणों को धोकर उसे
चरणामृत के रूप में स्वीकार किया तथा केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उस केवट ने अपने पूर्वजों को भी भव-बाधा से तार दिया।
चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक मान्यता में ही नहीं है वैज्ञानिक रूप भी है। चरणामृत का जल सदैव तांबे के पात्र में ही रखा जाता है। आयुर्वेदिक अनुसार तांबे के पात्र में अनेक तरह के रोगों को खत्म करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में मिल जाती है। उस जल का पिने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है तथा रोग नहीं होते है । इस जले में तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और अधिक बढ़ जाती है। ऐसा माना जाता है कि चरणामृत स्मरण
शक्ति को भी बढ़ाता है।
रोग तथा पाप को दूर करने के लिए भगवान का चरणामृत चमत्कारी औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसी भी मिला दिया जाए तो उसके औषधिय गुण में और अधिक वृद्धि हो जाती है।
चरणामृत सेवन करते समय निम्न श्लोक पढने का विधान है
चरणामृत अकाल मृत्यु को दूर रखता है।
हर प्रकार की बीमारी का नाश करता है। इसके सेवन से
जन्म- मरण से मुक्ति प्राप्त हो जाती है |
भगवान की आरती के बाद भगवान का
चरणामृत दिया जाता है। चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरण से प्राप्त अमृत। हिंदू धर्म में चरणामृत को बहुत ही शुद्ध व पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद ही इसका पिया जाता है। चरणामृत का पीना अमृत को पीने समान माना जाता है।