आज थोड़ी बात करेंगे भाग्य के बारे मे..
भाग्य कैसे बनता है?
क्यों लोग भाग्य को कोसते है?
क्या बिगाड़ा है भाग्य ने आपका?
या आपने क्या बिगाड़ा है भाग्य का?

सबसे मुख्य बात है, हमारे जीवन मे भूतपूर्व लिए गए निर्णयों का परिणाम होता है हमारा आज का भाग्य।
और हमारे आज, अभी, इसी क्षण लिए गए निर्णय का प्रतिफल होगा हमारा कल का भाग्य।

“बस इतनी सी परिभाषा है हमारे भाग्य की”

लेकिन जीवन के निर्णय तो इंसान अपनी #बुद्धिक्षमता अनुसार लेता है. एवं सबसे जरूरी बात ये है कि किसी भी प्रकार के निर्णय का जन्म उसके विचारों से उत्पन्न होता है.

एक बार फिर से पढ़िए.. “किसी भी प्रकार के निर्णय का जन्म मनुष्य के #विचारों से उत्पन्न होता है”

शायद, बात अब काफ़ी हद तक साफ़ एवं उचित प्रतीत होती है।
कि मनुष्य के भाग्य का जन्म उसकी #बुद्धिक्षमता एवं मनुष्य के स्वयं के #विचार होते है।

विचारों का कारकत्व प्राप्त है चंद्र देव को।।
एवं बुद्धिक्षमता का कारकत्व प्राप्त है बुध देव को।।

चंद्र तब तब अशुभ फल देगा, ज़ब ज़ब मन मे ईर्ष्या, द्वेष, लोलुपता, लोभ, लालच, घृणा, कुछ पाने की लालसा या कुछ खोने का भय आदि आदि का जन्म होगा, आपका चंद्र स्वतः ही दूषित होने लगेगा. और फिर मन मे गलत विचारों का जन्म होने लगता है. अतैव वर्तमान मे चल रही परिस्थितियों मे दूषित विचार (अर्थात ईर्ष्या, द्वेष, लोलुपता, लोभ, लालच, घृणा, कुछ पाने की लालसा या कुछ खोने का भय आदि आदि) के कारण वश स्वयं के लाभ या अल्प कालीन लाभ के लिए हम गलत निर्णय ले लेते है. और हमे पता भी नहीं रहता कि हमारे विचार अथवा सोच ही गलत थी अतः वक़्त पर हमने गलत निर्णय लिया।
और उस गलत निर्णय रुपी वृक्ष का दुर्भाग्य रुपी कड़वा फल मिलता है तो हम विचलित हो जाते है।

इसी तरह बुध तब तब अशुभ फल देगा, ज़ब ज़ब चालाकी, चतुराई, ज्यादा होशियारी, ठगी, बेईमानी, बुद्धू बनाना, बेवकूफ बनाना, किसी की लाचारी का लाभ उठाना आदि आदि का जन्म होता है. अतैव लाभ या लालच हेतु हम दूषित बुद्धि विवेक द्वारा (अर्थात चालाकी, चतुराई, ज्यादा होशियारी, ठगी, बेईमानी, बुद्धू बनाना, बेवकूफ बनाना, किसी की लाचारी का लाभ उठाना आदि आदि) या इन सब के कारणवश हम गलत निर्णय ले लेते है. और उसी तरह हम स्वयं को होशियार समझने के कारण हमे पता भी नहीं रहता कि हमारी होशियारी ने ही गलत निर्णय लिया।
और फिर उस चालाकी रुपी नौका पर दुर्भाग्य रुपी अथाह समुद्र मे हम निरंतर बढ़ते जाते है।

अतः यदि आपने अपने विचार एवं बुद्धि को निर्मल शुद्ध रख लिया तो भाग्य सौभाग्य बन के आपका साथ हर क्षण देता रहेगा. अन्यथा कर्म और भाग्य के बीच झगड़ा होता रहेगा एवं दुर्बुद्धि द्वारा उतपन्न दुर्भाग्य आपके सत्कर्म को भी कुकर्म मे परिवर्तित करता रहेगा।